Bengal Assembly Election: Nrc, Matua Factor Eyeing Fifth Round, Voting On 17 April Of 45 Seats In 6 Districts – बंगाल चुनाव: पांचवें दौर में एनआरसी, मतुआ फैक्टर पर नजर, 45 सीटों पर 17 अप्रैल को मतदान

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– फोटो : अमर उजाला

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पश्चिम बंगाल में सत्ता संग्राम का आधा सफर पूरा हो गया है। यानी 295 सीटों में से 135 सीटों पर मतदान हो चुका है। इस बार में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सामने भाजपा ने गंभीर चुनौती पेश की है। नए समीकरण में दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर है।

पांचवें चरण में शनिवार को राज्य के उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के कुल 6 जिलों की 45 सीटों पर मतदान होना है। जिसमें कुल 342 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम के हवाले होगी।

इस चरण में राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) नागरिकता संशोधन विधेयक में चाय जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। दरअसल, उत्तर बंगाल के तीन गोरखा बहुल जिलों दार्जिलिंग, कालिमपोंग और जलपईगुड़ी की 13 सीटों पर भाजपा मजबूत है तो दक्षिण बंगाल के 3 जिलों बर्दवान (पूर्व), उत्तर चौबीस परगना और नदिया जिले की 32 सीटों तृणमूल का दबदबा है।

उत्तर बंगाल के चाय बागान इलाकों में 4 जनजाति 10 से अधिक सीटों पर किसी भी दल का खेल खराब कर सकती है। इसलिए दोनों ही पार्टियों ने इन्हें निभाने में पूरा जोर लगाया। केंद्र ने चाय बागान मजदूरों के लिए 1000 करोड़ के पैकेज का बजट में प्रावधान किया था। वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकारी योजनाओं के तहत मजदूरों को पक्के मकान के कागजात बांट चुकी है।

मतुआ समुदाय की भूमिका अहम
दक्षिण बंगाल की 32 सीटों में से उत्तर 24 परगना और नदिया जिले की सीटों में मतुआ और मुसलमान वोट निर्णायक हैं। भाजपा की ओर से पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह सहित कई नेता रैलियां कर मतुआ को सीएए के तहत नागरिकता देने का वादा किया है। बांग्लादेश यात्रा को लेकर पीएम पर मतुआ समुदाय को लुभाने की कोशिश का आरोप लगा था।

2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 1.84 करोड़ है और इसमें 50 फीसदी मतुआ है। करीब 70 सीटों पर ये समुदाय जीत-हार में अहम भूमिका निभाता है। एनआरसी, सीएए का विरोध करने की वजह से हिंदू समुदाय ममता से नाराज था।

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मतुआ समुदाय से जुड़े कूचबिहार, जलपईगुड़ी, विष्णुपुर और बनगांव के क्षेत्रों में जीत हासिल की थी। यह समुदाय पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से से आता है। मतुआ समुदाय सीएए के तहत नागरिकता दिए जाने की मांग कर रहा है। भाजपा भी सीएए के माध्यम से मतुआ शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देना चाहती है। ऐसे में वे समुदाय भाजपा की ओर जा सकता है। एक समय ममता बनर्जी से भी इस समुदाय के अच्छे संबंध थे।

दार्जिलिंग और कालिमपोंग की 6 सीटों पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और चाय बागान मजदूरों का असर है। जलपईगुड़ी जिले में भी गोरखा आबादी बड़ी तादाद में हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अध्ययन विमल गुरुंग ने पहले ही अपने तेवर दिखा दिए हैं कि इस बार कूचबिहार हिंसा भाजपा के लिए सबक साबित होने वाली है।

शुरू से ही एनडीए के साथ रहे मोर्चा के दोनों गुट इस बार तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। वहीं दार्जिलिंग की सिलीगुड़ी सीट माकपा का मजबूत गढ़ रही है। वहां वर्ष 2012 और 2016 में भी माकपा ने जीत दर्ज की थी।

चौबीस परगना की 16 सीटों पर 40 प्रतिशत अल्पसंख्यक
पांचवें चरण में उत्तर चौबीस परगना की 16 सीटों पर मतदान होगा इन इलाकों में अल्पसंख्यकों की आबादी करीब 40 प्रतिशत है। तृणमूल कांग्रेस को अपने इस वोट बैंक के सहारे बेहतर प्रदर्शन का भरोसा है। हालांकि कुछ इलाकों में उसे भाजपा से कड़ी टक्कर मिल गई है।

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पश्चिम बंगाल में सत्ता संग्राम का आधा सफर पूरा हो गया है। यानी 295 सीटों में से 135 सीटों पर मतदान हो चुका है। इस बार में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सामने भाजपा ने गंभीर चुनौती पेश की है। नए समीकरण में दोनों दलों के बीच कांटे की टक्कर है।

पांचवें चरण में शनिवार को राज्य के उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के कुल 6 जिलों की 45 सीटों पर मतदान होना है। जिसमें कुल 342 प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम के हवाले होगी।

इस चरण में राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी) नागरिकता संशोधन विधेयक में चाय जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। दरअसल, उत्तर बंगाल के तीन गोरखा बहुल जिलों दार्जिलिंग, कालिमपोंग और जलपईगुड़ी की 13 सीटों पर भाजपा मजबूत है तो दक्षिण बंगाल के 3 जिलों बर्दवान (पूर्व), उत्तर चौबीस परगना और नदिया जिले की 32 सीटों तृणमूल का दबदबा है।


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10 से अधिक सीटों पर चाय जनजाति का असर


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